मासिक समसामयिकी पत्रिका
Current Affairs Monthly Compilation
दिनांक: 19 जून 2026
प्रकाशक: विक्रम ई-मित्र पोर्टल
बरौली, राजस्थान | हेल्प-लाइन: 9887579884, 6378811249
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विषय सूची (Table of Contents)
- 1. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर 2.0: आर्थिक औपचारिकीकरण और वैश्विक नेतृत्व में भारत की छलांगपेज 3
- 2. भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) वैश्विक सीमा-पार भुगतान पहल में केंद्र स्तर परपेज 4
- 3. ग्लोबल सप्लाई चेन रेजिलिएंस इनिशिएटिव (GSCRI) को मजबूत करना: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के विविधीकरण में भारत की महत्वपूर्ण भूमिकापेज 5
- 4. भारत ने उन्नत कार्बन बाजार ढाँचा अनावरण किया: हरित संक्रमण वित्तपोषण के लिए एक उत्प्रेरकपेज 6
- 5. भारत का राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: ऊर्जा संप्रभुता और निर्यात केंद्र के दर्जे की ओर अग्रसरपेज 7
- 6. भारत का सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र पीएलआई योजना 2.0 और उन्नत फैब निवेश के साथ वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयारपेज 8
- 7. परिसीमन आयोग: 2026 की जनगणना के उपरांत आसन्न अधिदेश और संघीय निहितार्थपेज 9
- 8. राज्यपाल की भूमिका: विवेकाधीन शक्तियों और संघीय तनावों का पुनर्मूल्यांकनपेज 10
- 9. समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक: संसदीय विचार-विमर्श और संवैधानिक अनिवार्यता को समझनापेज 11
- 10. फॉल्ट-टॉलरेंट क्वांटम कंप्यूटिंग हेतु क्वांटम त्रुटि सुधार और क्यूबिट सुसंगतता में सफलतापेज 12
- 11. कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन्नत कार्बन कैप्चर और अनुक्रमण में सफलता ला रही हैपेज 13
- 12. जीन संपादन की प्रगति फसल लचीलापन और पोषण संवर्धन में क्रांति ला रही हैपेज 14
- 13. प्रोजेक्ट घड़ियाल पुनरुद्धार और राष्ट्रीय नदी बेसिन पारिस्थितिक स्वास्थ्य सूचकांकपेज 15
- 14. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: हरित अमोनिया और हरित इस्पात में मील के पत्थरपेज 16
- 15. एकीकृत संसाधन प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय चक्रीय अर्थव्यवस्था ढांचा 2026पेज 17
- 16. पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP): चरण III का संचालनपेज 18
- 17. राजस्थान हरित हाइड्रोजन नीति 2026: एक स्थायी भविष्य का मार्ग प्रशस्त करनापेज 19
- 18. म्हारा विरासत, म्हारा गौरव: राजस्थान की डिजिटल विरासत संरक्षण पहलपेज 20
विक्रम ई-मित्र समसामयिकी संकलन
विक्रम ई-मित्र मासिक पत्रिकाअर्थव्यवस्था एवं विकास
1. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर 2.0: आर्थिक औपचारिकीकरण और वैश्विक नेतृत्व में भारत की छलांग
चर्चा में क्यों? (Why in News)
भारत ने हाल ही में ग्लोबल डीपीआई शिखर सम्मेलन 2026 की मेजबानी की, जिसमें ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) और अगली पीढ़ी के अकाउंट एग्रीगेटर (AA) फ्रेमवर्क में महत्वपूर्ण प्रगति सहित अपने व्यापक डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) स्टैक के उन्नत अनुप्रयोगों का प्रदर्शन किया गया। यह आयोजन विश्व बैंक की एक नई रिपोर्ट के साथ हुआ, जिसमें भारत के डीपीआई मॉडल की आर्थिक औपचारिकीकरण में तेजी लाने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने में इसकी परिवर्तनकारी भूमिका के लिए सराहना की गई।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •**भारत के डीपीआई स्टैक का विकास:** यूपीआई से परे, अब फोकस विभिन्न क्षेत्रों (खुदरा, गतिशीलता, स्वास्थ्य सेवा) में ओएनडीसी को व्यापक रूप से अपनाने और गहरा एकीकृत करने तथा सहज वित्तीय डेटा साझाकरण के लिए अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क की उन्नत कार्यात्मकताओं पर है।
- •**आर्थिक औपचारिकीकरण उत्प्रेरक:** डीपीआई अनौपचारिक व्यवसायों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए ऋण तक पहुंच में सुधार करने और अधिक दक्षता के साथ प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण को सक्षम करने में महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं।
- •**वैश्विक प्रतिकृति और सहयोग:** कई विकासशील राष्ट्र भारत के डीपीआई मॉडल को अपनाने पर विचार कर रहे हैं, जिससे द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग में वृद्धि हुई है, जिसमें भारत एक प्रमुख ज्ञान भागीदार और प्रौद्योगिकी प्रदाता के रूप में खुद को स्थापित कर रहा है।
- •**डेटा गवर्नेंस और साइबर सुरक्षा:** शिखर सम्मेलन ने विस्तारित डीपीआई पारिस्थितिकी तंत्र के सुरक्षित संचालन के लिए विश्वास बनाने और सुनिश्चित करने के लिए डेटा संरक्षण कानूनों और साइबर सुरक्षा फ्रेमवर्क को मजबूत करने के चल रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- इंडियास्टैक में आधार, यूपीआई, डिजीलॉकर और अकाउंट एग्रीगेटर (AA) जैसे सहमति-आधारित डेटा साझाकरण प्रणाली शामिल हैं।
- ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) का उद्देश्य प्लेटफॉर्म-केंद्रित मॉडल से एक ओपन-नेटवर्क मॉडल में स्थानांतरित होकर ई-कॉमर्स का लोकतंत्रीकरण करना है, जिसमें खरीदारों, विक्रेताओं और लॉजिस्टिक्स प्रदाताओं को एकीकृत किया जाएगा।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **वित्तीय समावेशन और आर्थिक विकास में भूमिका:** चर्चा करें कि कैसे डीपीआई बिना बैंक वाले और कम बैंक वाले लोगों के लिए औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुंच को सुविधाजनक बनाते हैं, डिजिटल भुगतानों को बढ़ावा देते हैं, सूक्ष्म-उद्यमिता को सक्षम करते हैं, और लेनदेन लागत को कम करते हैं, जिससे जीडीपी वृद्धि और गरीबी उन्मूलन में योगदान होता है।
- **चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाएं:** डीपीआई अपनाने से जुड़ी चुनौतियों का विश्लेषण करें, जिनमें डिजिटल साक्षरता अंतराल, गोपनीयता संबंधी चिंताएँ, बाजार एकाग्रता की संभावना और मजबूत शिकायत निवारण तंत्र की आवश्यकता शामिल है। कृषि, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों को अभिनव अनुप्रयोगों के माध्यम से बदलने के लिए डीपीआई की क्षमता का मूल्यांकन करें।
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2. भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) वैश्विक सीमा-पार भुगतान पहल में केंद्र स्तर पर
चर्चा में क्यों? (Why in News)
भारत ने बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) और राष्ट्रों के एक संघ के सहयोग से अपनी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) मॉडल, विशेष रूप से एकीकृत भुगतान इंटरफेस (UPI) और ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) को सीमा-पार भुगतानों और व्यापार के लिए एक बहुपक्षीय ढांचे में एकीकृत करने हेतु एक प्रमुख पायलट परियोजना की घोषणा की है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय प्रेषण और B2B लेनदेन से जुड़ी अक्षमताओं और उच्च लागतों को दूर करना है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •पायलट परियोजना, जिसका नाम 'ग्लोबलपे कनेक्ट' है, प्रारंभ में पांच भागीदार देशों को शामिल करेगी, जो वास्तविक समय, अंतर-संचालित सीमा-पार लेनदेन के लिए भारत के सिद्ध DPI वास्तुकला का लाभ उठाएगी।
- •केंद्रित क्षेत्रों में प्रेषण की दक्षता बढ़ाना, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) के व्यापार को सुविधाजनक बनाना और तत्काल सीमा-पार खुदरा भुगतान की क्षमता का पता लगाना शामिल है।
- •ढांचा विविध राष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों के सुरक्षित, अनुपालनकारी और स्केलेबल एकीकरण को सुनिश्चित करने के लिए सामान्य तकनीकी मानकों और नियामक सैंडबॉक्स वातावरण स्थापित करने का प्रयास करता है।
- •यह कदम पारंपरिक संवाददाता बैंकिंग मॉडल से वैश्विक वित्तीय कनेक्टिविटी के लिए एक ओपन-सोर्स, सार्वजनिक वस्तु दृष्टिकोण की ओर एक प्रतिमान बदलाव का प्रतीक है, जिससे लेनदेन लागत में 50% तक की कमी आ सकती है।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- एकीकृत भुगतान इंटरफेस (UPI) नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) द्वारा तत्काल बैंक-टू-बैंक लेनदेन के लिए विकसित एक वास्तविक समय भुगतान प्रणाली है।
- ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) द्वारा भारत में डिजिटल वाणिज्य में क्रांति लाने के लिए एक सुविधाजनक मॉडल बनाने की एक पहल है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **भू-राजनीतिक और आर्थिक निहितार्थ:** भारत के DPI को विश्व स्तर पर अपनाने से इसकी सॉफ्ट पावर मजबूत हो सकती है, साझेदार राष्ट्रों के साथ आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा मिल सकता है, और प्रमुख वैश्विक वित्तीय मध्यस्थों पर निर्भरता कम हो सकती है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली प्रभावित होगी।
- **वित्तीय समावेशन और MSME सशक्तिकरण:** कम लेनदेन लागत और बढ़ी हुई पहुंच से सस्ते प्रेषण के माध्यम से प्रवासी श्रमिकों को काफी लाभ होगा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में आसान भागीदारी और उनके बाजार की पहुंच का विस्तार करके MSME को सशक्त बनाया जाएगा।
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3. ग्लोबल सप्लाई चेन रेजिलिएंस इनिशिएटिव (GSCRI) को मजबूत करना: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के विविधीकरण में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका
चर्चा में क्यों? (Why in News)
भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया सहित ग्लोबल सप्लाई चेन रेजिलिएंस इनिशिएटिव (GSCRI) के सदस्य देशों की मंत्रिस्तरीय बैठक हाल ही में गहन सहयोग और ठोस निवेश परियोजनाओं पर जोर देते हुए एक संयुक्त घोषणा के साथ संपन्न हुई। बैठक में प्रमुख आसियान भागीदारों को शामिल करने के लिए GSCRI सदस्यता के संभावित विस्तार पर भी विचार-विमर्श किया गया, जो भू-राजनीतिक बदलावों और अप्रत्याशित व्यवधानों के मद्देनजर विविध और मजबूत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की आवश्यकता की बढ़ती मान्यता को उजागर करता है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •**विस्तारित सदस्यता और दायरा:** GSCRI के भौगोलिक और क्षेत्रीय कवरेज को व्यापक बनाने के लिए अधिक समान विचारधारा वाले राष्ट्रों, विशेष रूप से दक्षिण पूर्व एशिया में, को शामिल करने के लिए चर्चा चल रही है, जिसमें महत्वपूर्ण खनिजों, सेमीकंडक्टरों और फार्मास्यूटिकल्स पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
- •**ठोस निवेश और सहयोग परियोजनाएं:** सदस्यों ने बुनियादी ढाँचे, रसद और विनिर्माण विविधीकरण परियोजनाओं में संयुक्त निवेश के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की, जिसका उद्देश्य एकल-देश आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना और क्षेत्रीय उत्पादन नेटवर्क को मजबूत करना है।
- •**सूचना साझाकरण और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली:** संभावित आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों पर वास्तविक समय की जानकारी के आदान-प्रदान के लिए उन्नत तंत्र और साझा प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के विकास को सक्रिय प्रतिक्रियाओं को सक्षम करने के लिए प्राथमिकता दी गई।
- •**भारत की 'मेक इन इंडिया' और पीएलआई तालमेल:** भारत ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे उसकी 'मेक इन इंडिया' पहल और उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं घरेलू विनिर्माण क्षमताओं में योगदान दे रही हैं, जिससे यह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण के लिए एक विश्वसनीय और आकर्षक भागीदार बन गया है।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- GSCRI को शुरू में 2021 में जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत द्वारा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में लचीली आपूर्ति श्रृंखला बनाने के लिए लॉन्च किया गया था।
- इस पहल का उद्देश्य महत्वपूर्ण वस्तुओं के लिए विशिष्ट देशों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना और सोर्सिंग विकल्पों में विविधता लाना है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **आर्थिक सुरक्षा के लिए आपूर्ति श्रृंखला लचीलेपन का महत्व:** विश्लेषण करें कि GSCRI हाल की वैश्विक घटनाओं (जैसे, महामारी, भू-राजनीतिक तनाव) द्वारा उजागर की गई कमजोरियों को कैसे संबोधित करता है और विविध सोर्सिंग और विनिर्माण अड्डों के माध्यम से आर्थिक स्थिरता, व्यापार पूर्वानुमेयता और राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान देता है।
- **भारत का रणनीतिक महत्व और चुनौतियाँ:** GSCRI के उद्देश्यों को बढ़ाने में एक लोकतांत्रिक विनिर्माण केंद्र, इसके विशाल बाजार और कुशल कार्यबल के रूप में भारत की अनूठी स्थिति पर चर्चा करें। बुनियादी ढाँचे के अंतराल, व्यापार करने में आसानी और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के साथ एकीकरण जैसी चुनौतियों की जाँच करें, और उन्हें दूर करने के लिए नीतिगत उपायों का सुझाव दें।
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4. भारत ने उन्नत कार्बन बाजार ढाँचा अनावरण किया: हरित संक्रमण वित्तपोषण के लिए एक उत्प्रेरक
चर्चा में क्यों? (Why in News)
विद्युत मंत्रालय ने ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) और केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) के साथ मिलकर भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) ढांचे में व्यापक संशोधन जारी किए हैं। संशोधित दिशानिर्देशों का उद्देश्य बाजार तरलता को मजबूत करना, पारदर्शी मूल्य निर्धारण सुनिश्चित करना और घरेलू कार्बन बाजार को वैश्विक मानकों के अनुरूप लाना है, जिससे यह भारत के महत्वाकांक्षी हरित संक्रमण लक्ष्यों के वित्तपोषण के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बन गया है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •उन्नत CCTS में अब पात्र परियोजनाओं की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है, विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, सतत कृषि और कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
- •एक समर्पित 'हरित संक्रमण कोष' स्थापित किया गया है, जो कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग राजस्व के एक हिस्से का लाभ उठा रहा है ताकि अभिनव निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों और औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन प्रयासों के लिए उत्प्रेरक पूंजी प्रदान की जा सके।
- •भारत के कार्बन बाजार को चुनिंदा वैश्विक योजनाओं के साथ अंतर्राष्ट्रीय रूप से जोड़ने के लिए नए प्रावधानों की खोज की जा रही है, जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सुविधाजनक बना सकते हैं और हरित परियोजनाओं में विदेशी निवेश को आकर्षित कर सकते हैं।
- •जारी किए गए कार्बन क्रेडिट की अखंडता और विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए मजबूत शिकायत निवारण तंत्र के साथ सख्त निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन (MRV) प्रोटोकॉल पेश किए गए हैं।
- •बिजली उत्पादन से परे ऊर्जा-गहन क्षेत्रों को शामिल करने के लिए अनिवार्य भागीदारी का विस्तार किया गया है, जिससे अर्थव्यवस्था भर में उत्सर्जन न्यूनीकरण रणनीतियों को व्यापक रूप से अपनाया जा सके।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) को भारत में घरेलू कार्बन बाजार बनाने के लिए ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 के तहत स्थापित किया गया था।
- ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) ऊर्जा दक्षता उपायों को लागू करने और CCTS ढांचे को विकसित करने के लिए नोडल एजेंसी है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **डीकार्बोनाइजेशन के लिए आर्थिक प्रोत्साहन:** एक सुचारू रूप से कार्य करने वाला कार्बन बाजार कार्बन के लिए एक मूल्य संकेत प्रदान करता है, उद्योगों को स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और प्रक्रियाओं में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिससे हरित अर्थव्यवस्था में नवाचार और प्रतिस्पर्धी लाभ को बढ़ावा मिलता है।
- **चुनौतियाँ और अवसर:** जबकि उन्नत ढांचा महत्वपूर्ण क्षमता प्रदान करता है, चुनौतियों में बाजार स्थिरता सुनिश्चित करना, ग्रीनवॉशिंग को रोकना, क्षेत्रों के बीच लाभों का समान वितरण और प्रभावी कार्यान्वयन और निरीक्षण के लिए मजबूत संस्थागत क्षमता निर्माण की आवश्यकता शामिल है।
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5. भारत का राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: ऊर्जा संप्रभुता और निर्यात केंद्र के दर्जे की ओर अग्रसर
चर्चा में क्यों? (Why in News)
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने हाल ही में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) की अपनी व्यापक मध्यावधि समीक्षा जारी की, जिसमें घरेलू उत्पादन क्षमताओं की स्थापना और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण प्रगति पर प्रकाश डाला गया। समीक्षा में 2030 के लक्ष्यों को प्राप्त करने में तेजी लाने के लिए संशोधित रणनीतियों और नीतिगत समायोजनों की रूपरेखा तैयार की गई है, जिससे भारत हरित हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात में वैश्विक अग्रणी के रूप में स्थापित हो सके।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •**त्वरित उत्पादन क्षमता:** समीक्षा में इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण इकाइयों और हरित हाइड्रोजन उत्पादन सुविधाओं को चालू करने में तेजी का उल्लेख किया गया, जो मुख्य रूप से एनजीएचएम के तहत ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन (SIGHT) कार्यक्रम के लिए रणनीतिक हस्तक्षेपों द्वारा संचालित है।
- •**अनुसंधान और विकास पर ध्यान:** हरित हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और परिवहन में लागत में कमी के लिए अनुसंधान एवं विकास में महत्वपूर्ण निवेश किया गया है, जिसमें ईंधन सेल प्रौद्योगिकी और कुशल इलेक्ट्रोलाइज़र डिजाइनों में प्रगति शामिल है।
- •**मांग सृजन और क्षेत्रीय एकीकरण:** उर्वरक, रिफाइनरी और स्टील जैसे कठिन-से-कम करने वाले क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन की मांग को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ गतिशीलता और बिजली उत्पादन में इसके अनुप्रयोग की खोज के लिए नीतियां बनाई जा रही हैं।
- •**अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और निर्यात क्षमता:** भारत जर्मनी, जापान और यूएई जैसे देशों के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, संयुक्त उद्यम और भविष्य के निर्यात को सुविधाजनक बनाने के लिए हरित हाइड्रोजन गलियारे स्थापित करने के लिए सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM) का लक्ष्य 2030 तक प्रति वर्ष 5 एमएमटी (मिलियन मीट्रिक टन) हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता हासिल करना है।
- एनजीएचएम का एक घटक, एसआईजीएचटी (ग्रीन हाइड्रोजन ट्रांजिशन के लिए रणनीतिक हस्तक्षेप) कार्यक्रम, इलेक्ट्रोलाइज़र विनिर्माण और हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करता है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव:** भारत की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने, जीवाश्म ईंधन आयात को कम करने, रोजगार सृजित करने और जलवायु परिवर्तन शमन लक्ष्यों (NDC) में योगदान करने की NGHM की क्षमता का मूल्यांकन करें। औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन और चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में इसकी भूमिका का विश्लेषण करें।
- **चुनौतियाँ और नीतिगत हस्तक्षेप:** हरित हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ाने में प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा करें, जिसमें उच्च प्रारंभिक लागत, बुनियादी ढाँचा विकास (पाइपलाइन, भंडारण), पानी की उपलब्धता और इलेक्ट्रोलाइसिस के लिए नवीकरणीय ऊर्जा सुरक्षित करना शामिल है। मांग-पक्ष प्रोत्साहन, नियामक ढाँचे और अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण तंत्र जैसे नीतिगत हस्तक्षेपों का सुझाव दें।
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6. भारत का सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र पीएलआई योजना 2.0 और उन्नत फैब निवेश के साथ वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार
चर्चा में क्यों? (Why in News)
भारत ने अपनी 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहलों को महत्वपूर्ण बढ़ावा देते हुए सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले विनिर्माण के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना 2.0 के रोलआउट की घोषणा की है, साथ ही देश में उन्नत फैब्रिकेशन (फैब) इकाइयाँ स्थापित करने के लिए दो वैश्विक नेताओं से प्रतिबद्धताएँ भी प्राप्त की हैं। इस रणनीतिक कदम का उद्देश्य भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करना और तकनीकी संप्रभुता को बढ़ाना है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •सेमीकंडक्टरों के लिए पीएलआई योजना 2.0 उन्नत वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करती है, जिसमें उच्च पूंजीगत व्यय समर्थन और परिचालन लागत सब्सिडी शामिल है, विशेष रूप से उन्नत प्रक्रिया नोड्स (28nm से नीचे) और असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP) इकाइयों को लक्षित करती है।
- •नया नीतिगत ढांचा केवल विनिर्माण से परे एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को प्राथमिकता देता है, जिसमें डिजाइन, आर एंड डी, विशेष कौशल विकास और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला एकीकरण शामिल हैं।
- •दो वैश्विक सेमीकंडक्टर दिग्गजों ने अत्याधुनिक फैब स्थापित करने के लिए अरबों डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है, जिसमें एक मेमोरी चिप्स पर केंद्रित है और दूसरा लॉजिक चिप्स पर, जो भारत में अत्याधुनिक तकनीक ला रहा है।
- •स्वदेशी डिजाइन क्षमताओं को बढ़ावा देने और भारतीय स्टार्टअप्स और वैश्विक उद्योग के नेताओं के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए 'डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI)' योजना के विस्तार पर जोर दिया गया है।
- •इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के तहत एक समर्पित 'सेमीकंडक्टर स्किल काउंसिल' विशेष पाठ्यक्रमों और अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों के माध्यम से प्रतिभा विकास में तेजी लाएगी।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन के भीतर एक विशेष और स्वतंत्र व्यावसायिक प्रभाग है, जिसे भारत के सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले पारिस्थितिकी तंत्र के विकास को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया है।
- प्रोसेस नोड एक ट्रांजिस्टर के न्यूनतम फीचर आकार को संदर्भित करता है, जिसे आमतौर पर नैनोमीटर (nm) में मापा जाता है, जो चिप के प्रदर्शन और बिजली दक्षता को इंगित करता है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **आर्थिक सुरक्षा के लिए रणनीतिक अनिवार्यता:** सेमीकंडक्टर विनिर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना भारत की आर्थिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों के प्रति भेद्यता को कम करता है, और इसे डिजिटल अर्थव्यवस्था और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में सबसे आगे रखता है।
- **चुनौतियाँ और सतत विकास:** निरंतर उच्च-तकनीकी निवेश आकर्षित करने, एक गहन प्रतिभा पूल विकसित करने, फैब के लिए लगातार बिजली और पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने, और सेमीकंडक्टर उद्योग की पूंजी-गहन और तेजी से विकसित प्रकृति को नेविगेट करने में महत्वपूर्ण चुनौतियाँ बनी हुई हैं, जिसके लिए निरंतर नीतिगत समर्थन और दीर्घकालिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
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7. परिसीमन आयोग: 2026 की जनगणना के उपरांत आसन्न अधिदेश और संघीय निहितार्थ
चर्चा में क्यों? (Why in News)
चूंकि लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों के पुनर्समायोजन पर संवैधानिक रोक 2026 में समाप्त होने वाली है, आगामी 2026 की जनगणना के उपरांत अगले परिसीमन आयोग के गठन और उसके अधिदेश को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं, जिससे समान प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उठ रहे हैं।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •**संवैधानिक आधार:** भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 संसद और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के प्रत्येक जनगणना के बाद पुनर्समायोजन (परिसीमन) को अनिवार्य करते हैं, जिससे आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।
- •**वर्तमान रोक (अनुच्छेद 82 और 170 के परंतुक):** 84वें संशोधन अधिनियम, 2001 ने जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन पर रोक को 2026 के बाद आयोजित पहली जनगणना तक बढ़ा दिया था। इसका प्राथमिक उद्देश्य राज्यों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व खोने के डर के बिना परिवार नियोजन नीतियों को लागू करने के लिए प्रोत्साहित करना था।
- •**आसन्न चुनौती:** 2026 की जनगणना के आंकड़े अगले परिसीमन का आधार होंगे। इससे सीट आवंटन में महत्वपूर्ण बदलाव होने की संभावना है, जहां जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने वाले राज्य उच्च वृद्धि दर वाले राज्यों के लिए सीटें खो सकते हैं, खासकर दक्षिणी बनाम उत्तरी राज्यों पर इसका प्रभाव पड़ेगा।
- •**संघवाद और प्रतिनिधित्व:** बदली हुई सीट वितरण की संभावना न्याय, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू करने वाले राज्यों के संभावित राजनीतिक मताधिकार से वंचित होने के बारे में चिंताएं बढ़ाती है, जिससे सहकारी संघवाद के सिद्धांत को चुनौती मिलती है।
- •**परिसीमन की प्रक्रिया:** एक परिसीमन आयोग, जिसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है और जिसमें अध्यक्ष के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, और संबंधित राज्य चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते हैं, यह अभ्यास करता है। इसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और इन्हें किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- •**चिंताएं और सुधार:** बहसों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए राज्यों को कथित रूप से दंडित करने, प्रतिनिधित्व के वैकल्पिक तरीकों, और 'एक व्यक्ति, एक वोट' सिद्धांत को संघीय समानता के साथ संरेखित करने के लिए संभावित संवैधानिक संशोधनों को संबोधित करना शामिल है।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 क्रमशः लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित हैं।
- परिसीमन पर वर्तमान रोक 2001 की जनसंख्या के आंकड़ों पर आधारित है और 2026 के बाद की पहली जनगणना के उपरांत समाप्त होने वाली है।
- परिसीमन आयोग एक उच्चाधिकार प्राप्त निकाय है जिसके आदेश अंतिम होते हैं और अदालतों में वाद योग्य नहीं होते हैं।
- 84वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2001 ने सीट पुनर्समायोजन पर रोक को बढ़ाया।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- लोकसभा में राज्यों के बीच शक्ति संतुलन पर 2026 के बाद के परिसीमन के संभावित प्रभाव और संघवाद पर इसके निहितार्थों का विश्लेषण करें, विशेष रूप से उत्तर-दक्षिण विभाजन पर।
- चर्चा करें कि 'एक व्यक्ति, एक वोट' सिद्धांत को जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने और जनसांख्यिकीय संक्रमण को सफलतापूर्वक प्रबंधित करने वाले राज्यों के लिए समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की आवश्यकता के साथ कैसे reconciled किया जा सकता है।
- एक नए परिसीमन अभ्यास से जुड़ी संवैधानिक और राजनीतिक चुनौतियों का परीक्षण करें, जिसमें क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए संभावित संवैधानिक संशोधनों या एक नए ढांचे की आवश्यकता शामिल है।
- आसन्न परिसीमन से उत्पन्न चिंताओं को दूर करने के लिए प्रतिनिधित्व के वैकल्पिक मॉडलों, जैसे कि एक बड़ा राज्यसभा या भारित मतदान तंत्र, के पक्ष और विपक्ष में तर्कों का मूल्यांकन करें।
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8. राज्यपाल की भूमिका: विवेकाधीन शक्तियों और संघीय तनावों का पुनर्मूल्यांकन
चर्चा में क्यों? (Why in News)
कई राज्यों में हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों, जिनमें विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को स्वीकृति देने में लंबी देरी और विवादास्पद नियुक्तियां शामिल हैं, ने राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों को नए सिरे से जांच के दायरे में ला दिया है, जिससे भारत की संघीय संरचना में शक्तियों के नाजुक संतुलन पर बहस तेज हो गई है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •**संवैधानिक प्रावधान:** अनुच्छेद 153-162 राज्यपाल की नियुक्ति, कार्यकाल और शक्तियों से संबंधित हैं। प्रमुख शक्तियों में विधेयकों को स्वीकृति देना (अनुच्छेद 200), राष्ट्रपति के विचार के लिए विधेयकों को आरक्षित करना (अनुच्छेद 201), मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की नियुक्ति करना (अनुच्छेद 164), और संवैधानिक तंत्र की विफलता की रिपोर्ट करना (अनुच्छेद 356) शामिल हैं।
- •**विवेकाधीन शक्तियाँ:** यद्यपि मंत्रिपरिषद की 'सहायता और सलाह' (अनुच्छेद 163) से काफी हद तक बाध्य होते हुए भी, राज्यपाल को कुछ विवेकाधीन शक्तियाँ प्राप्त हैं, विशेष रूप से ऐसी स्थितियों में जैसे कि त्रिशंकु विधानसभा में मुख्यमंत्री का चयन करना, विश्वास खो चुके मंत्रालय को बर्खास्त करना, और विधेयकों को आरक्षित करना।
- •**'केंद्र का एजेंट' बनाम 'संवैधानिक प्रमुख':** आलोचक अक्सर राज्यपाल को राज्य के एक निष्पक्ष संवैधानिक प्रमुख के बजाय 'केंद्र के एजेंट' (राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है) के रूप में देखते हैं, खासकर जब कार्य केंद्र में सत्तारूढ़ दल के पक्ष में प्रतीत होते हैं।
- •**सरकारिया और पुंछी आयोग:** केंद्र-राज्य संबंधों पर दोनों आयोगों ने राज्यपाल की भूमिका के संबंध में महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, जिसमें तटस्थता, विवेक का प्रयोग करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश, और नियुक्ति से पहले मुख्यमंत्री के साथ परामर्श की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
- •**न्यायिक घोषणाएँ:** एस.आर. बोम्मई मामले (1994) जैसे ऐतिहासिक निर्णयों ने राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 356 के मनमाने उपयोग को प्रतिबंधित किया है, यह इस बात पर जोर देते हुए कि बहुमत का परीक्षण करने के लिए विधानसभा का पटल, न कि राज्यपाल का व्यक्तिपरक आकलन, उचित मंच है।
- •**वर्तमान बहसें:** विधेयकों को स्वीकृति देने के लिए 'उचित समय' को परिभाषित करने, राष्ट्रपति के विचार के लिए विधेयकों को आरक्षित करने के मानदंड, और यह सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करें कि संवैधानिक निकायों (जैसे राज्य चुनाव आयोग या लोक सेवा आयोग) में नियुक्तियां राजनीतिक प्रभाव से मुक्त हों।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- अनुच्छेद 153: प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।
- अनुच्छेद 200 राज्यपाल द्वारा विधेयकों को स्वीकृति देने, स्वीकृति रोकने, या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करने से संबंधित है।
- एस.आर. बोम्मई वाद (1994) ने अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को काफी हद तक प्रतिबंधित किया।
- राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- राज्य के संवैधानिक प्रमुख बनाम केंद्र के एजेंट के रूप में राज्यपाल की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें, विशेष रूप से विधेयकों को स्वीकृति देने और सरकार गठन से संबंधित हालिया विवादों के आलोक में।
- राज्यपाल की भूमिका पर सरकारिया आयोग और पुंछी आयोग की सिफारिशों का विश्लेषण करें। इन सिफारिशों को किस हद तक लागू किया गया है, और राज्यपाल की निष्पक्षता सुनिश्चित करने में क्या चुनौतियां बनी हुई हैं?
- भारत में सहकारी संघवाद और संसदीय लोकतंत्र पर राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के निहितार्थों पर चर्चा करें। बेहतर संतुलन स्थापित करने के लिए संभावित सुधारों का सुझाव दें।
- जांच करें कि न्यायिक घोषणाओं, जैसे कि एस.आर. बोम्मई वाद ने राज्यपाल की शक्तियों, विशेष रूप से अनुच्छेद 356 और बहुमत के परीक्षण के संबंध में समझ और सीमाओं को कैसे आकार दिया है।
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9. समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक: संसदीय विचार-विमर्श और संवैधानिक अनिवार्यता को समझना
चर्चा में क्यों? (Why in News)
एक संसदीय स्थायी समिति कथित तौर पर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक के मसौदे पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के अंतिम चरण में है, जो आगामी सत्र में इसके संभावित पेश किए जाने का संकेत दे रही है। यह व्यापक सार्वजनिक परामर्शों और विशेषज्ञ विचार-विमर्शों के बाद हो रहा है, जिससे इसकी संवैधानिक व्यवहार्यता और सामाजिक निहितार्थों पर राष्ट्रीय बहस फिर से शुरू हो गई है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •**संवैधानिक अधिदेश (अनुच्छेद 44):** समान नागरिक संहिता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत (डीपीएसपी) के रूप में निहित है, जिसमें कहा गया है कि 'राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।'
- •**ऐतिहासिक संदर्भ:** यूसीसी पर बहस संविधान सभा के समय से चली आ रही है। जबकि इसे मौलिक अधिकार नहीं बनाया गया था, इसे डीपीएसपी में शामिल किया गया था ताकि राज्य भारत के विविध सामाजिक ताने-बाने का सम्मान करते हुए धीरे-धीरे इसकी दिशा में काम कर सके।
- •**गोवा नागरिक संहिता:** गोवा एकमात्र भारतीय राज्य है जिसमें वर्तमान में समान नागरिक संहिता है, जो उसे अपने पुर्तगाली औपनिवेशिक अतीत से विरासत में मिली है। यह विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के संबंध में गोवा के सभी समुदायों पर लागू होती है।
- •**यूसीसी के लिए प्रमुख तर्क:** समर्थकों का तर्क है कि यूसीसी राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देता है, व्यक्तिगत कानूनों में भेदभावपूर्ण प्रथाओं को हटाकर लैंगिक न्याय और समानता सुनिश्चित करता है, और नागरिक मामलों से धर्म को अलग करके धर्मनिरपेक्षता को कायम रखता है। इसका उद्देश्य कानूनी ढांचे को सरल बनाना है।
- •**यूसीसी के खिलाफ प्रमुख तर्क:** विरोधी धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के संभावित उल्लंघन, बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण के थोपने, सांस्कृतिक विविधता के क्षरण, और पर्याप्त सहमति के बिना विविध व्यक्तिगत कानूनों को एकीकृत करने में व्यावहारिक चुनौतियों के बारे में चिंताएं उठाते हैं।
- •**संसदीय समिति की भूमिका:** समिति की रिपोर्ट से विभिन्न चिंताओं को संबोधित करने की उम्मीद है, जिसमें 'एकता' की परिभाषा (क्या इसका अर्थ पूर्ण एकरूपता या सर्वोत्तम प्रथाओं का सामंजस्य है), कार्यान्वयन रणनीति, और अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना शामिल है।
- •**विधि आयोग के विचार:** पिछले विधि आयोग की रिपोर्टों ने या तो सुझाव दिया है कि यूसीसी 'इस स्तर पर न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है' (2018) या मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों में सुधार के लिए 'एक क्रमिक और वृद्धिशील दृष्टिकोण' का आह्वान किया है, जिसमें एक एकल समान कानून के बजाय संहिताकरण पर जोर दिया गया है।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता से संबंधित है, जो राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों (भाग IV) के अंतर्गत आता है।
- गोवा एकमात्र भारतीय राज्य है जहाँ समान नागरिक संहिता लागू है।
- शाह बानो बेगम मामला (1985) ने मुस्लिम महिलाओं के लिए भरण-पोषण के संबंध में यूसीसी पर बहस को सामने लाया।
- यूसीसी का उद्देश्य विविध व्यक्तिगत कानूनों (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी कानून) को कानूनों के एक सामान्य सेट से प्रतिस्थापित करना है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- भारत में समान नागरिक संहिता को लागू करने की संवैधानिक वैधता और निहितार्थों का विश्लेषण करें, डीपीएसपी बनाम अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) जैसे मौलिक अधिकारों के रूप में इसकी स्थिति पर विचार करते हुए।
- समान नागरिक संहिता के पक्ष और विपक्ष में तर्कों पर चर्चा करें, लैंगिक न्याय, राष्ट्रीय एकीकरण और धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने की इसकी क्षमता बनाम सांस्कृतिक विविधता और अल्पसंख्यक अधिकारों के बारे में चिंताओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए।
- गोवा नागरिक संहिता और विभिन्न विधि आयोगों की सिफारिशों के साथ समानताएं खींचते हुए, भारत जैसे विविध देश में समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने और उसे लागू करने में शामिल चुनौतियों का परीक्षण करें।
- समान नागरिक संहिता विभिन्न धार्मिक समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों को कैसे प्रभावित कर सकती है और विभिन्न हितधारकों की चिंताओं को दूर करने और सहमति सुनिश्चित करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं, इसका आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
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10. फॉल्ट-टॉलरेंट क्वांटम कंप्यूटिंग हेतु क्वांटम त्रुटि सुधार और क्यूबिट सुसंगतता में सफलता
चर्चा में क्यों? (Why in News)
राष्ट्रीय क्वांटम कंप्यूटिंग केंद्र (NQCC) के शोधकर्ताओं ने क्यूबिट सुसंगतता समय और त्रुटि सुधार प्रोटोकॉल को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण प्रगति की घोषणा की है, जिससे फॉल्ट-टॉलरेंट क्वांटम कंप्यूटिंग वास्तविकता के करीब आ रही है। यह सफलता व्यावहारिक अनुप्रयोगों के लिए क्वांटम प्रणालियों को बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक का समाधान करती है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •**उन्नत क्यूबिट सुसंगतता**: लगभग परिवेशी परिस्थितियों में सुपरकंडक्टिंग क्यूबिट्स के लिए अभूतपूर्व सुसंगतता समय प्राप्त किया गया, जिससे महत्वपूर्ण पर्यावरणीय शोर चुनौतियों पर काबू पाया जा सका।
- •**नवीन त्रुटि सुधार कोड**: क्वांटम त्रुटि सुधार (QEC) कोड का एक नया वर्ग विकसित और प्रदर्शित किया गया, जो क्वांटम जानकारी के महत्वपूर्ण नुकसान के बिना त्रुटियों का पता लगाने और उन्हें सुधारने में बेहतर प्रदर्शन दर्शाता है।
- •**मॉड्यूलर वास्तुकला**: डिज़ाइन में एक मॉड्यूलर दृष्टिकोण शामिल है, जो कई क्यूबिट रजिस्टरों के स्केलेबल एकीकरण की अनुमति देता है, जो बड़े क्वांटम कंप्यूटर बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
- •**फॉल्ट-टॉलरेंस के लिए निहितार्थ**: यह विकास 'नॉइज़ी इंटरमीडिएट-स्केल क्वांटम' (NISQ) युग से परे, जटिल संगणनाओं को विश्वसनीय रूप से निष्पादित करने में सक्षम फॉल्ट-टॉलरेंट क्वांटम कंप्यूटर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- •**रणनीतिक राष्ट्रीय महत्व**: देश को वैश्विक क्वांटम दौड़ में सबसे आगे रखता है, जिससे क्रिप्टोग्राफी, सामग्री विज्ञान और दवा खोज पर प्रभाव पड़ता है।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- क्वांटम उलझाव (entanglement) और अध्यारोपण (superposition) क्वांटम कंप्यूटिंग के अंतर्निहित मौलिक सिद्धांत हैं।
- प्रमुख क्यूबिट तकनीकों में सुपरकंडक्टिंग क्यूबिट्स, ट्रैप्ड आयन, फोटोनिक क्यूबिट्स और टोपोलॉजिकल क्यूबिट्स शामिल हैं।
- क्वांटम त्रुटि सुधार आवश्यक है क्योंकि क्यूबिट्स पर्यावरणीय अंतःक्रियाओं के कारण डीकोहेरेंस (क्वांटम अवस्था का नुकसान) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं।
- 'नॉइज़ी इंटरमीडिएट-स्केल क्वांटम' (NISQ) युग सीमित क्यूबिट्स और उच्च त्रुटि दरों वाले वर्तमान क्वांटम कंप्यूटरों को संदर्भित करता है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **क्वांटम कंप्यूटिंग के रणनीतिक निहितार्थ**: राष्ट्रीय सुरक्षा (क्रिप्टोग्राफी, साइबर युद्ध), आर्थिक प्रतिस्पर्धा (दवा खोज, सामग्री विज्ञान, वित्तीय मॉडलिंग), और तकनीकी संप्रभुता पर संभावित प्रभाव पर चर्चा करें, जिसमें भारत के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन पर प्रकाश डाला गया हो।
- **क्वांटम कंप्यूटरों को बढ़ाने में चुनौतियाँ**: क्यूबिट स्थिरता, त्रुटि दर, नियंत्रण प्रणालियों की मापनीयता और मजबूत त्रुटि सुधार की आवश्यकता जैसी वर्तमान बाधाओं का विश्लेषण करें, साथ ही उन पर काबू पाने के वैश्विक प्रयासों का भी विश्लेषण करें। नैतिक विचारों और दोहरे उपयोग के पहलुओं पर चर्चा करें।
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11. कृत्रिम बुद्धिमत्ता उन्नत कार्बन कैप्चर और अनुक्रमण में सफलता ला रही है
चर्चा में क्यों? (Why in News)
भारतीय विज्ञान संस्थान और प्रमुख तकनीकी फर्मों सहित एक वैश्विक संघ ने एक AI-संचालित मंच लॉन्च किया है जो डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC) और कार्बन कैप्चर और भंडारण (BECCS) प्रौद्योगिकियों के साथ बायोएनर्जी की दक्षता और मापनीयता को महत्वपूर्ण रूप से अनुकूलित करता है। यह पहल कार्बन अनुक्रमण प्रक्रियाओं को परिष्कृत करके जलवायु परिवर्तन शमन प्रयासों में तेजी लाने का वादा करती है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •**सामग्री खोज का अनुकूलन**: AI एल्गोरिदम का उपयोग DAC के लिए नए, अधिक कुशल शोषक सामग्री (sorbent materials) की खोज के लिए किया जाता है, जिससे उच्च CO2 सोखने की क्षमता वाले नए यौगिकों की स्क्रीनिंग और संश्लेषण में तेजी आती है।
- •**प्रक्रिया दक्षता में वृद्धि**: मशीन लर्निंग मॉडल DAC और BECCS संयंत्रों के लिए इष्टतम परिचालन स्थितियों (तापमान, दबाव, प्रवाह दर) की भविष्यवाणी करते हैं, जिससे महत्वपूर्ण ऊर्जा बचत और CO2 कैप्चर दरों में वृद्धि होती है।
- •**मापनीयता और स्थल चयन**: AI भूगर्भीय, भूकंपीय और पर्यावरणीय जानकारी के विशाल डेटासेट का विश्लेषण करके पकड़े गए CO2 के लिए इष्टतम भूगर्भीय भंडारण स्थलों की पहचान करने में मदद करता है, जिससे दीर्घकालिक, सुरक्षित अनुक्रमण सुनिश्चित होता है।
- •**प्रकृति-आधारित समाधानों का एकीकरण**: AI प्रकृति-आधारित कार्बन सिंक (जैसे, वनीकरण, पुनर्योजी कृषि) की प्रभावशीलता को मैप करने और निगरानी करने में सहायता करता है, अधिकतम कार्बन कमी के लिए इष्टतम हस्तक्षेप रणनीतियों का मार्गदर्शन करता है।
- •**आर्थिक व्यवहार्यता**: परिचालन लागत को कम करके और कैप्चर दक्षता में सुधार करके, AI-संचालित समाधान व्यापक तैनाती के लिए कार्बन कैप्चर और अनुक्रमण को अधिक आर्थिक रूप से व्यवहार्य बना रहे हैं।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) प्रौद्योगिकियां औद्योगिक स्रोतों या वातावरण से CO2 उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य रखती हैं।
- डायरेक्ट एयर कैप्चर (DAC) एक ऐसी तकनीक है जो परिवेशी हवा से सीधे CO2 को पकड़ती है।
- कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (BECCS) के साथ बायोएनर्जी बायोमास ऊर्जा उत्पादन को कार्बन कैप्चर के साथ जोड़ती है, जिससे संभावित रूप से शुद्ध नकारात्मक उत्सर्जन होता है।
- CO2 को लवणीय जलभृतों (saline aquifers), समाप्त तेल और गैस जलाशयों, या अनुपयोगी कोयला सीमों में भूगर्भीय रूप से संग्रहीत किया जा सकता है।
- भारत की जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) सतत विकास और शमन रणनीतियों पर जोर देती है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **जलवायु परिवर्तन शमन में AI की भूमिका**: चर्चा करें कि AI CCUS, नवीकरणीय ऊर्जा अनुकूलन और जलवायु मॉडलिंग सहित जलवायु प्रौद्योगिकियों के विकास और तैनाती को कैसे तेज कर सकता है, साथ ही AI की नैतिक चिंताओं, ऊर्जा खपत और डेटा गोपनीयता मुद्दों पर भी विचार करें।
- **CCUS के लिए नीतिगत और आर्थिक चुनौतियाँ**: भारत और विश्व स्तर पर CCUS प्रौद्योगिकियों की बड़े पैमाने पर तैनाती के लिए आवश्यक वित्तीय प्रोत्साहनों, नियामक ढाँचों, सार्वजनिक स्वीकृति और बुनियादी ढांचे के विकास का विश्लेषण करें, जिसमें कार्बन बाजारों और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की क्षमता भी शामिल है।
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12. जीन संपादन की प्रगति फसल लचीलापन और पोषण संवर्धन में क्रांति ला रही है
चर्चा में क्यों? (Why in News)
ICAR सहित वैश्विक कृषि अनुसंधान संस्थानों ने जीन-संपादित फसलों के विकास में महत्वपूर्ण सफलताओं की घोषणा की है जो सूखे और कीटों जैसे जलवायु तनावों के प्रति उच्च प्रतिरोध, साथ ही बेहतर पोषण प्रोफाइल प्रदर्शित करती हैं। यह स्थायी खाद्य सुरक्षा के लिए जैव प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने में एक महत्वपूर्ण क्षण को चिह्नित करता है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •**CRISPR-Cas9 प्रगति**: परिष्कृत CRISPR-Cas9 प्रणालियों और बेस एडिटिंग तकनीकों का उपयोग करके पौधों के जीनोम को सटीक रूप से बदला गया, जिससे विदेशी डीएनए को शामिल किए बिना वांछित लक्षण पेश किए गए, जो उन्हें पारंपरिक आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) से अलग करता है।
- •**जलवायु लचीलापन**: विकसित फसलें (जैसे, गेहूं, मक्का, चावल) जिनमें बेहतर सूखा सहिष्णुता, गर्मी प्रतिरोध और उन्नत रोगज़नक़ रक्षा तंत्र शामिल हैं, कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- •**पोषण संवर्धन**: सफलतापूर्वक मुख्य फसलों को इंजीनियर किया गया ताकि आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की सामग्री (जैसे, चावल में विटामिन ए, फलियों में लोहा, अनाजों में बढ़ा हुआ प्रोटीन) बढ़ाई जा सके, जिससे कमजोर आबादी में छिपी भूख और कुपोषण का समाधान हो सके।
- •**कृषि-रासायनिक निर्भरता में कमी**: कीट और रोग प्रतिरोध के लिए डिज़ाइन की गई जीन-संपादित फसलें रासायनिक कीटनाशकों और शाकनाशकों की आवश्यकता को काफी कम कर सकती हैं, जिससे पर्यावरण के अनुकूल और लागत प्रभावी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा मिलता है।
- •**त्वरित प्रजनन चक्र**: पारंपरिक प्रजनन विधियों की तुलना में नई फसल किस्मों को विकसित करने के लिए जीन संपादन की सटीकता और गति आवश्यक समय को नाटकीय रूप से कम करती है, जिससे बदलती कृषि मांगों और पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए त्वरित अनुकूलन संभव होता है।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- CRISPR-Cas9 (क्लस्टर्ड रेगुलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पालिंड्रोमिक रिपीट्स और CRISPR-एसोसिएटेड प्रोटीन 9) जीवाणु रक्षा प्रणालियों से प्राप्त एक क्रांतिकारी जीन-संपादन उपकरण है।
- जीन-संपादित फसलें पारंपरिक GMOs से भिन्न होती हैं क्योंकि उनमें आमतौर पर अन्य प्रजातियों से जीन (ट्रांसजेनेसिस) डाले बिना पौधे के अपने जीनोम में सटीक संशोधन शामिल होते हैं।
- गोल्डन राइस विटामिन ए (बीटा-कैरोटीन) से संवर्धित आनुवंशिक रूप से संशोधित फसल का एक उदाहरण है, जिसे ट्रांसजेनेसिस के माध्यम से विकसित किया गया है, न कि आमतौर पर जीन संपादन से।
- ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) भारत में कृषि में अनुसंधान और शिक्षा के समन्वय, मार्गदर्शन और प्रबंधन के लिए सर्वोच्च निकाय है।
- बायोफोर्टिफिकेशन कृषि पद्धतियों, पारंपरिक पादप प्रजनन, या आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से खाद्य फसलों के पोषण मूल्य को बढ़ाने की प्रक्रिया है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि के लिए क्षमता**: मूल्यांकन करें कि जीन-संपादन प्रौद्योगिकियां वैश्विक खाद्य सुरक्षा चुनौतियों का कैसे समाधान कर सकती हैं, कृषि स्थिरता में सुधार कर सकती हैं, किसानों की आजीविका बढ़ा सकती हैं, और जलवायु परिवर्तन और बढ़ती आबादी के संदर्भ में पर्यावरणीय पदचिह्न को कम कर सकती हैं, जिसमें भारत के विशिष्ट उदाहरणों का हवाला दिया गया हो।
- **नैतिक, नियामक और सार्वजनिक स्वीकृति के मुद्दे**: जीन संपादन से संबंधित नैतिक चिंताओं, जीन-संपादित फसलों के लिए मजबूत और विभेदित नियामक ढाँचों की आवश्यकता (GMOs की तुलना में), और सार्वजनिक विश्वास और स्वीकृति को बढ़ावा देने की रणनीतियों पर चर्चा करें, जिसमें भारत और विश्व स्तर पर सामाजिक-आर्थिक निहितार्थों पर विचार किया गया हो।
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13. प्रोजेक्ट घड़ियाल पुनरुद्धार और राष्ट्रीय नदी बेसिन पारिस्थितिक स्वास्थ्य सूचकांक
चर्चा में क्यों? (Why in News)
गंभीर रूप से लुप्तप्राय घड़ियालों के लिए हाल ही में सफल प्रजनन कार्यक्रम और एक नई राष्ट्रीय नीति पहल, साथ ही नदी बेसिन के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का आकलन करने के लिए एक नवीन ढांचे ने नदी संरक्षण को प्रमुखता प्रदान की है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •'प्रोजेक्ट घड़ियाल पुनरुद्धार' का शुभारंभ, जिसमें आवास बहाली, बंदी प्रजनन और पुनःप्रवर्तन कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
- •गंडक और कोसी जैसे साझा नदी पारिस्थितिकी प्रणालियों के लिए नेपाल के साथ सीमा-पार सहयोग पर जोर।
- •जैव विविधता और प्रदूषण स्तरों की निगरानी के लिए 'राष्ट्रीय नदी बेसिन पारिस्थितिक स्वास्थ्य सूचकांक' का परिचय।
- •प्रमुख घड़ियाल आवासों के साथ समुदाय-नेतृत्व वाले संरक्षण प्रयासों के लिए प्रायोगिक परियोजनाएँ, स्थानीय आजीविका को एकीकृत करते हुए।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- घड़ियाल (Gavialis gangeticus) को IUCN रेड लिस्ट में गंभीर रूप से लुप्तप्राय के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
- वे मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भागों में स्वच्छ मीठे पानी की नदी प्रणालियों में पाए जाते हैं, जो अपनी लंबी, पतली थूथन से अन्य मगरमच्छों से भिन्न होते हैं।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- जलीय प्रजातियों के लिए सीमा-पार संरक्षण प्रयासों में चुनौतियों और अवसरों पर चर्चा करें, जिसमें राजनयिक और पारिस्थितिक जटिलताओं पर प्रकाश डाला गया हो।
- दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता प्राप्त करने में प्रजाति-विशिष्ट संरक्षण परियोजनाओं (जैसे प्रोजेक्ट टाइगर) बनाम व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित दृष्टिकोणों (जैसे नदी बेसिन स्वास्थ्य सूचकांक) की प्रभावकारिता का विश्लेषण करें।
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14. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: हरित अमोनिया और हरित इस्पात में मील के पत्थर
चर्चा में क्यों? (Why in News)
भारत ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत अपना पहला बड़े पैमाने का हरित अमोनिया उत्पादन संयंत्र चालू कर दिया है, साथ ही इस्पात निर्माण में हरित हाइड्रोजन को एकीकृत करने के लिए नई नीतिगत प्रोत्साहन की घोषणा भी की है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित नए हरित अमोनिया संयंत्र ने उर्वरक क्षेत्र को कार्बन-मुक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
- •नीतिगत प्रोत्साहनों में हरित हाइड्रोजन-आधारित इस्पात उत्पादन के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) और कम जीएसटी शामिल हैं।
- •हरित इस्पात प्रौद्योगिकियों को अपनाने और बढ़ाने में तेजी लाने के लिए प्रमुख औद्योगिक खिलाड़ियों के साथ रणनीतिक साझेदारी की गई।
- •बुनियादी ढांचे के विकास और वितरण को सुविधाजनक बनाने के लिए समर्पित हरित हाइड्रोजन गलियारों की स्थापना के लिए प्रतिबद्धता।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- हरित हाइड्रोजन का उत्पादन नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग करके जल के इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादन के दौरान शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है।
- अमोनिया (NH3) उर्वरक, प्रशीतन और रासायनिक उद्योगों के लिए एक महत्वपूर्ण इनपुट है, जिसे परंपरागत रूप से जीवाश्म ईंधन के साथ ऊर्जा-गहन हैबर-बॉश प्रक्रिया का उपयोग करके उत्पादित किया जाता है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- हरित हाइड्रोजन के लिए भारत के आक्रामक अभियान के आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन करें, जिसमें आयात निर्भरता को कम करने और जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने की इसकी क्षमता पर विचार किया गया हो।
- लागत, बुनियादी ढांचे और तकनीकी बाधाओं सहित विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन उत्पादन और अपनाने को बढ़ाने में आने वाली चुनौतियों का गंभीर रूप से परीक्षण करें।
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15. एकीकृत संसाधन प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय चक्रीय अर्थव्यवस्था ढांचा 2026
चर्चा में क्यों? (Why in News)
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 'राष्ट्रीय चक्रीय अर्थव्यवस्था ढांचा 2026' का अनावरण किया है, जो विभिन्न क्षेत्रों में संसाधन दक्षता और अपशिष्ट में कमी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक व्यापक नीति दस्तावेज है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •यह ढांचा 'कम करें, पुन: उपयोग करें, पुनर्चक्रण करें, पुनः प्राप्त करें' (reduce, reuse, recycle, recover) दृष्टिकोण पर जोर देता है, जो रैखिक आर्थिक मॉडल से आगे बढ़ता है।
- •यह इलेक्ट्रॉनिक्स, निर्माण और विध्वंस, प्लास्टिक और वस्त्र जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में सामग्री पुनर्प्राप्ति दरों के लिए कड़े लक्ष्य निर्धारित करता है।
- •विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) तंत्रों को मजबूत किया गया है और उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला को कवर करने के लिए विस्तारित किया गया है।
- •स्थायी उत्पादन और उपभोग को प्रोत्साहित करने के लिए इको-डिजाइन सिद्धांतों और हरित सार्वजनिक खरीद नीतियों को बढ़ावा देना।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- एक चक्रीय अर्थव्यवस्था का उद्देश्य उत्पादों, घटकों और सामग्रियों को हर समय उनकी उच्चतम उपयोगिता और मूल्य पर बनाए रखना है, जिससे अपशिष्ट कम हो।
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) एक पर्यावरणीय नीति दृष्टिकोण है जिसमें किसी उत्पाद के लिए उत्पादक की जिम्मेदारी को उत्पाद के जीवनचक्र के उपभोक्ता-पश्चात चरण तक बढ़ाया जाता है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- चर्चा करें कि राष्ट्रीय चक्रीय अर्थव्यवस्था ढांचा 2026 भारत के सतत विकास लक्ष्यों में कैसे योगदान कर सकता है, जिसमें रोजगार सृजन, संसाधन सुरक्षा और प्रदूषण उपशमन की इसकी क्षमता पर ध्यान केंद्रित किया गया हो।
- व्यवहारिक परिवर्तन, तकनीकी बुनियादी ढांचे और अनौपचारिक अपशिष्ट क्षेत्र के एकीकरण सहित राष्ट्रव्यापी चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल को लागू करने में आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण करें।
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16. पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP): चरण III का संचालन
चर्चा में क्यों? (Why in News)
राजस्थान सरकार ने पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP) के चरण III के पूर्ण संचालन की घोषणा की है, जो कई जिलों को सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराने में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •चरण III का ध्यान सवाई माधोपुर, करौली और दौसा जैसे जिलों में अतिरिक्त 2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधाएँ प्रदान करने और लगभग 20 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने पर है।
- •परियोजना में चंबल नदी बेसिन और उसकी सहायक नदियों (काली सिंध, परवन, मेज) के अधिशेष जल को जल-घाटे वाले बनास, गंभीरी और पार्वती उप-बेसिनों में अंतर-बेसिन स्थानांतरण शामिल है।
- •ERCP का लक्ष्य पूर्वी राजस्थान के 13 जिलों में गंभीर जल संकट के मुद्दों का समाधान करना है, जो राज्य की 40% से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- •इसमें आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकें, जैसे सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियाँ और नहरों की लाइनिंग शामिल हैं, ताकि पानी का कुशल उपयोग सुनिश्चित किया जा सके और नुकसान को कम किया जा सके।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- ERCP 13 जिलों को कवर करता है: झालावाड़, बारां, कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर, अजमेर, टोंक, दौसा, करौली, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, जयपुर।
- परियोजना में नवनेरा बैराज और महालपुर बैराज सहित कुल 26 बड़े और मध्यम बांधों/बैराजों तथा अंतर-संबंधित नहरों का निर्माण परिकल्पित है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **क्षेत्रीय सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन:** ERCP कृषि उत्पादकता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ावा देने, किसानों की आय में वृद्धि, खाद्य सुरक्षा और लाभार्थी जिलों में ग्रामीण समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए तैयार है। पानी की उपलब्धता औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा देगी और जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों से पलायन को संबोधित करेगी।
- **अंतर-राज्यीय जल विवाद समाधान और चुनौतियाँ:** यद्यपि यह मुख्य रूप से एक अंतर-राज्यीय परियोजना है, चंबल बेसिन के पानी पर ERCP की निर्भरता के कारण ऐतिहासिक रूप से मध्य प्रदेश के साथ चर्चा हुई है। सफल कार्यान्वयन अंतर-राज्यीय प्रभावी सहयोग और भविष्य के संघर्षों को रोकने तथा न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करने के लिए स्थायी जल संसाधन प्रबंधन रणनीतियों पर निर्भर करता है।
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17. राजस्थान हरित हाइड्रोजन नीति 2026: एक स्थायी भविष्य का मार्ग प्रशस्त करना
चर्चा में क्यों? (Why in News)
राजस्थान सरकार ने आधिकारिक तौर पर 'राजस्थान हरित हाइड्रोजन नीति 2026' का शुभारंभ किया है, जिसका लक्ष्य राज्य को भारत में हरित हाइड्रोजन उत्पादन और उपयोग के लिए एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •यह नीति राजस्थान की प्रचुर नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता (सौर और पवन) का लाभ उठाते हुए 2030 तक प्रति वर्ष 1 मिलियन मीट्रिक टन (MMTPA) हरित हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य रखती है।
- •यह राजकोषीय प्रोत्साहन का एक व्यापक पैकेज प्रदान करती है, जिसमें पूंजीगत सब्सिडी, ब्याज सबवेंशन, बिजली शुल्क से छूट और हरित हाइड्रोजन परियोजनाओं के लिए कम व्हीलिंग शुल्क शामिल है।
- •यह नीति उच्च नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वाले क्षेत्रों, जैसे जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर में समर्पित हरित हाइड्रोजन हब के विकास पर जोर देती है।
- •यह राज्य के भीतर एक मजबूत हरित हाइड्रोजन पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान और विकास, कौशल विकास और राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों के साथ सहयोग को बढ़ावा देती है।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- नीति के कार्यान्वयन के लिए नोडल एजेंसी राजस्थान अक्षय ऊर्जा निगम लिमिटेड (RRECL) है।
- नीति प्रोत्साहन के लिए योग्य होने हेतु हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए कम से कम 80% नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को अनिवार्य करती है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **ऊर्जा संक्रमण और आर्थिक विविधीकरण के लिए रणनीतिक महत्व:** राजस्थान की हरित हाइड्रोजन नीति भारत के व्यापक ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और शुद्ध-शून्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है। राज्य के लिए, यह आर्थिक विविधीकरण, बड़े पैमाने पर निवेश आकर्षित करने और भविष्य-प्रूफ उद्योग में उच्च-कुशल रोजगार सृजित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करती है।
- **बुनियादी ढांचे के विकास और बाजार निर्माण में चुनौतियाँ:** जबकि नीति एक मजबूत ढाँचा प्रदान करती है, बड़े पैमाने पर हरित हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और परिवहन के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे के विकास में चुनौतियाँ बनी हुई हैं। प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण के साथ-साथ मजबूत घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मांग का निर्माण, राजस्थान में हरित हाइड्रोजन को सफलतापूर्वक अपनाने और आर्थिक व्यवहार्यता के लिए महत्वपूर्ण होगा।
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18. म्हारा विरासत, म्हारा गौरव: राजस्थान की डिजिटल विरासत संरक्षण पहल
चर्चा में क्यों? (Why in News)
राजस्थान पुरातत्व और संग्रहालय विभाग ने उन्नत प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का दस्तावेजीकरण, संरक्षण और प्रचार करने के लिए एक व्यापक डिजिटल पहल 'म्हारा विरासत, म्हारा गौरव' का शुभारंभ किया है।
मुख्य बिंदु एवं विश्लेषण (Key Highlights)
- •इस पहल में प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों, जिनमें प्रमुख किले, महल, मंदिर और बावड़ियाँ शामिल हैं, की उच्च-परिशुद्धता वाली डिजिटल प्रतिकृतियाँ बनाने के लिए 3डी लेजर स्कैनिंग (LiDAR), फोटोग्राममेट्री और ड्रोन मैपिंग शामिल है।
- •एक केंद्रीय डिजिटल भंडार स्थापित किया जाएगा, जिसमें विस्तृत स्थापत्य डेटा, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और इंटरैक्टिव वर्चुअल टूर होंगे, जो शोधकर्ताओं, पर्यटकों और दुनिया भर के आम जनता के लिए सुलभ होंगे।
- •इसका उद्देश्य पूर्वानुमानित संरक्षण, संरचनात्मक परिवर्तनों की निगरानी और राजस्थान की विरासत पर व्यक्तिगत शैक्षिक सामग्री विकसित करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का लाभ उठाना है।
- •परियोजना नागरिक विज्ञान पहलों के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करती है, स्थानीय लोगों को मौखिक इतिहास, पारंपरिक ज्ञान और कम ज्ञात ऐतिहासिक तथ्यों का योगदान करने के लिए आमंत्रित करती है, इस प्रकार अमूर्त विरासत को एकीकृत करती है।
प्रारंभिक परीक्षा दृष्टिकोण:
- प्रारंभिक चरण में राजस्थान के पांच यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों को लक्षित किया गया है: जंतर मंतर (जयपुर), राजस्थान के पहाड़ी किले (चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, गागरोन, आमेर, जैसलमेर) और जयपुर शहर।
- यह पहल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर (IITJ) और विभिन्न निजी प्रौद्योगिकी फर्मों के सहयोग से कार्यान्वित की जा रही है।
मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण:
- **सांस्कृतिक पर्यटन और आर्थिक अवसरों को बढ़ाना:** डिजिटल संरक्षण पहल व्यापक वैश्विक दर्शकों को आकर्षित करके और भौतिक स्थलों पर आगंतुकों की संख्या बढ़ाकर, गहन आभासी अनुभव प्रदान करके विरासत पर्यटन में क्रांति ला सकती है। पर्यटन पेशकशों का यह विविधीकरण राजस्व उत्पन्न करेगा, रोजगार सृजित करेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन करेगा, जो राज्य के स्थायी पर्यटन विकास लक्ष्यों के अनुरूप है।
- **उन्नत संरक्षण रणनीतियाँ और जोखिम न्यूनीकरण:** 3डी मैपिंग और एआई जैसी प्रौद्योगिकियों का लाभ उठाने से सक्रिय और सटीक संरक्षण प्रयासों की अनुमति मिलती है। इसमें संरचनात्मक अखंडता की निगरानी करना, क्षय की पहचान करना, बहाली की योजना बनाना और पर्यावरणीय कारकों या मानवीय प्रभाव से होने वाले जोखिमों को कम करना शामिल है। यह पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर, भविष्य की पीढ़ियों के लिए राजस्थान की अपूरणीय विरासत की दीर्घायु और प्रामाणिकता सुनिश्चित करता है।
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